प्रेमचंद के नाटकों में सामाजिक चेतना

Authors

  • हेमलता चंद्राकर शोधार्थी भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ. ग.) Author
  • डॉ. मो. अज़हर खान शोध-निर्देशक , सहायक प्राध्यापक (हिंदी विभाग), भारती विश्वविद्यालय, दुर्ग (छ. ग.) Author

Keywords:

नाटक, नैतिकता, संघर्ष, रचनाशीलता, संवेदना, शोषण, उत्पीड़न, विघटन, किसान, मध्यवर्ग, गुलामी, सरोकार, स्त्री-चेतना, आत्मसम्मान।

Abstract

हिंदी साहित्य के युग प्रवर्तक लेखक मुंशी प्रेमचंद ने कथा साहित्य के साथ-साथ नाटक विधा में भी अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी है। यद्यपि उनका नाटक लेखन सीमित रहा, फिर भी उनके नाटकों में सामाजिक यथार्थ, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं की गहरी अभिव्यक्ति मिलती है। ‘संग्राम’, ‘कर्बला’ और ‘प्रेम की वेदी’ उनके ऐसे नाटक हैं जो न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सामाजिक चेतना के वाहक भी हैं। इन नाटकों में प्रेमचंद ने भारतीय समाज की जटिलताओं, धार्मिक-सांस्कृतिक संघर्षों, स्त्री-पुरुष संबंधों तथा नैतिक द्वंद्वों को अत्यंत संवेदनशीलता और गहराई से प्रस्तुत किया है। ‘संग्राम’ में जहाँ वर्ग-संघर्ष और स्त्री सशक्तिकरण की झलक मिलती है, वहीं ‘कर्बला’ में धर्म और बलिदान की पराकाष्ठा है, जबकि ‘प्रेम की वेदी’ में प्रेम और सामाजिक रूढ़ियों के बीच टकराव को दर्शाया गया है। प्रेमचंद की रचनाशीलता हमारे अपने समय की रचनाशीलता से बनती हुई आज की तमाम रचनाशीलताओं के लिए नये-नये सवाल खड़े करती है।

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Published

2026-06-25

How to Cite

प्रेमचंद के नाटकों में सामाजिक चेतना . (2026). AXIS International Journal of Multidisciplinary Research (AIJMR), 2(2), 23-26. https://axisjournal.com/index.php/files/article/view/37